Posts

तुम

मैंने तुम्हारे पसन्द की चूल्हे की रोटी बनायी है  वही फूली हुयी करारी सी  जिसे तुम चाव से खाते हो  और ये लो हरी हरी  खटाई वाली चटनी  ये तुम्हें बहुत पसन्द हैं ना !!!  पेट भर खा ल...
ये आँसू नहीं हैं पागल किसने कहा तुमसे? कि मैं रोती हूँ अब मैं नहीं रोती मेरे भीतर बरसों से जमी संवेदनाएँ पिघल रही हैं धीरे धीरे भावनाएँ रिस रही हैं खून जम गया है और म...

हे पार्थ !

हे पार्थ ! मैं सिंहासन पर बैठा अपने धर्म और कर्म से अंधा मनुष्य , मैं धृतराष्ट्र देखता रहा , सुनता रहा और द्रोपती के चीरहरण में सभ्यता , संस्कृति तार तार हुयी धर्म के सारे अध्याय बंद हुए , तब मैं बोला धर्म के विरुद्ध जब मैं अंधा था पर आज आँखें होते हुए भी नहीं देख पाता आज सिंहासन पर बैठा मैं मौन हूँ उस सिंहासन से बोलने के पश्चात हे पार्थ सदियों से आज तक मैं मौन हूँ। दीप्ति शर्मा

कंकाल

शमशान में रात दिन जलती चिताओं का उड्ता धुँआ सबको दिखता है पर तिल तिल जल, मन का कंकाल बनना किसी को नहीं दिखता । -- दीप्ति शर्मा

सपना

घुप्प अँधेरा पसरा  है बाहर दूर खलियानों से भीतर के कोनों तक । एका एक बारिस और छत से गिरता पानी बिजली की गडगडाहट भी डरा रही है । दियासलाई के डिब्बे में भी सिर्फ एक दियासलाई , उससे भी लालटेन जला दी , वो भी भप भप कर जलती दिख रही है , शायद तेल कम है । तभी पास में रखे उजले डिब्बे की तरफ निगाह गयी जो अपनी रौशनी से जगमगा रहा है उसे हाथ में उठा लिया , जिसमें जुगनू आपस में भिड रहे हैं , जो मैंने एक एक कर जमा किये जैसे कह रहे हों मैं तुझसे ज्यादा चमकता हूँ और इस भिंडत में , और ज्यादा रौशन हो रहे हैं । उन्हें देखते हुए सब भूल दिवार पर सिर टिका बैठ गयी तभी तेज़ आँधी और तुफान आने से मेरे हाथों से , वो जुगनुओं का डिब्बा छुट गया जुगनू छितरा गये बिखर गये इधर उधर मैं हतप्रत बस देखती रही इतना अँधेरा !!!! अब लालटेन भी बुझ चुकी है पेड उखड गये हैं , पौधे टूट गये हैं मेरी छत भी तो उड गयी है उस तूफान में सब बिखर गया । तभी दूर से आती हल्की रौशनी अब और तेज़ होने लगी हर तरफ फैल गयी और मैं मलते देखती हूँ कि सवेरा हो गया वो आँधी , बारिस , अँधेरा सब पीछे छूट गया वो मे...

दमित इच्छा

इंद्रियों का फैलता जाल भीतर तक चीरता माँस के लटके चिथड़े चोटिल हूँ बताता है मटर की फली की भाँति कोई बात कैद है उस छिलके में जिसे खोल दूँ तो ये इंद्रियाँ घेर लेंगी और भेदती रहेंगी उसे परत दर परत लहुलुहाल होने तक बिसरे खून की छाप के साथ क्या मोक्ष पा जायेगी या परत दर परत उतारेगी अपना वजूद / अस्तित्व या जल जायेगी चूल्हें की राख की तरह वो एक बात जो अब सुलगने लगी है। ----दीप्ति शर्मा
रुको !!! मैं कहता रहा तुम्हें आखिर कब तक मेरी आवाज़ तुम्हें मौन प्रतित होती रहेगी  । --- दीप्ति शर्मा