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हे पार्थ !

हे पार्थ ! मैं सिंहासन पर बैठा अपने धर्म और कर्म से अंधा मनुष्य , मैं धृतराष्ट्र देखता रहा , सुनता रहा और द्रोपती के चीरहरण में सभ्यता , संस्कृति तार तार हुयी धर्म के सारे अध्याय बंद हुए , तब मैं बोला धर्म के विरुद्ध जब मैं अंधा था पर आज आँखें होते हुए भी नहीं देख पाता आज सिंहासन पर बैठा मैं मौन हूँ उस सिंहासन से बोलने के पश्चात हे पार्थ सदियों से आज तक मैं मौन हूँ। दीप्ति शर्मा

कंकाल

शमशान में रात दिन जलती चिताओं का उड्ता धुँआ सबको दिखता है पर तिल तिल जल, मन का कंकाल बनना किसी को नहीं दिखता । -- दीप्ति शर्मा

सपना

घुप्प अँधेरा पसरा  है बाहर दूर खलियानों से भीतर के कोनों तक । एका एक बारिस और छत से गिरता पानी बिजली की गडगडाहट भी डरा रही है । दियासलाई के डिब्बे में भी सिर्फ एक दियासलाई , उससे भी लालटेन जला दी , वो भी भप भप कर जलती दिख रही है , शायद तेल कम है । तभी पास में रखे उजले डिब्बे की तरफ निगाह गयी जो अपनी रौशनी से जगमगा रहा है उसे हाथ में उठा लिया , जिसमें जुगनू आपस में भिड रहे हैं , जो मैंने एक एक कर जमा किये जैसे कह रहे हों मैं तुझसे ज्यादा चमकता हूँ और इस भिंडत में , और ज्यादा रौशन हो रहे हैं । उन्हें देखते हुए सब भूल दिवार पर सिर टिका बैठ गयी तभी तेज़ आँधी और तुफान आने से मेरे हाथों से , वो जुगनुओं का डिब्बा छुट गया जुगनू छितरा गये बिखर गये इधर उधर मैं हतप्रत बस देखती रही इतना अँधेरा !!!! अब लालटेन भी बुझ चुकी है पेड उखड गये हैं , पौधे टूट गये हैं मेरी छत भी तो उड गयी है उस तूफान में सब बिखर गया । तभी दूर से आती हल्की रौशनी अब और तेज़ होने लगी हर तरफ फैल गयी और मैं मलते देखती हूँ कि सवेरा हो गया वो आँधी , बारिस , अँधेरा सब पीछे छूट गया वो मे...

दमित इच्छा

इंद्रियों का फैलता जाल भीतर तक चीरता माँस के लटके चिथड़े चोटिल हूँ बताता है मटर की फली की भाँति कोई बात कैद है उस छिलके में जिसे खोल दूँ तो ये इंद्रियाँ घेर लेंगी और भेदती रहेंगी उसे परत दर परत लहुलुहाल होने तक बिसरे खून की छाप के साथ क्या मोक्ष पा जायेगी या परत दर परत उतारेगी अपना वजूद / अस्तित्व या जल जायेगी चूल्हें की राख की तरह वो एक बात जो अब सुलगने लगी है। ----दीप्ति शर्मा
रुको !!! मैं कहता रहा तुम्हें आखिर कब तक मेरी आवाज़ तुम्हें मौन प्रतित होती रहेगी  । --- दीप्ति शर्मा 

मुस्कुराहट

मैं भागता रहा मैं चीखता रहा सड़कों पर । साथ छूटता रहा मैं ढूंढ्ता रहा मोड़ो पर । दम घुटता रहा मैं चलता रहा शहर के हर कोनों पर। वो नहीं मिली शून्य में लुप्त हुई एक मासूम मुस्कुराहट ।   --   दीप्ति शर्मा

हाँ मैं दलित स्त्री हूँ

मैं तो  बरसों  की भाँती  आज भी यहीं हूँ तुम्हारे साथ पर तुम्हारी सोच नहीं बदली पत्थर तोडते मेरे हाथ पसीने से तर हुई देह और तुम्हारी काम दृष्टि नहीं बदली अब तक ये हाथों की रेखाएँ माथे पर पडी सलवटें बच्चों का पेट नहीं भर सकती मैं जानती हूँ और तुम भी कंकाल बन बिस्तर पर पड जाना मेरा यही चाहते हो तुम तुम कैसे नहीं सुन पाते सिसकियाँ भूखे पेट सोते बच्चों की मेरे भीतर मरती स्त्री की मैं  दलित हूँ हाँ मैं दलित स्त्री हूँ पर लाचार नहीं भर सकती हूँ पेट तुम्हारे  बिना अपना और बच्चों का अब मेरे घर चूल्हा भी जलेगा और रोटी भी पकेगी मेरे बच्चें भूखें नहीं सोयेंगे । तुम्हारे कंगूरे , तुम्हारी वासना तुम्हारी रोटियों , तुम्हारी निगाहों सब को छोड‌ आई हूँ मैं । -- दीप्ति शर्मा