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जिन्दगी

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                             रात के अँधेरे साये में वो चिडचिडाती रौशनी कभी राह दिखाती है तो कभी बस आँखों में चुभती सी नजर आती है | यक़ीनन उस रौशनी के भीतर कोई ख्वाब , कोई उम्मीद है जो पल पल जलती है , पर उसी वेग से जगती भी जाती है | अथाह मन में उत्पन्न हर बात और विचित्र विडंबनाओ से जूझती जिन्दगी , क्या कोई उम्मीद पूरी कर पायेगी या इस रौशनी में इसकी चमक फीकी पड़ जाएगी| अद्रीश की तरह ऊँचाई का कोई मुकाम पा मेरी जिन्दगी  आज किसी तारे की तरह आकाश में  टिमटिमाएगी   या धूमिल हो कोई अकस बन रह जाएगी | हर एक चाह की तपिश  में तप, मेरी उम्मीद एक नयी राह दिखाएगी | कभी रौशनी में जिन्दगी पिलकायी जाएगी तो कभी दिल की गहराई से नापी जाएगी | साथ ले अपना अक्स बस चलती ही जाएगी | कभी आत्मा को झकझोर देगी तो कभी पत्थरो से टकरा उड़ती चली जाएगी | कभी अपनी  मुस्कान  में खुद  को जान  उस उम्मीद को पहचानने की आस  से उसका असर देखेगी  , तो कभी हर एहसास  के साये ...

ख्वाहिश की है |

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                               रौशन  जहाँ  की ही ख्वाहिश की है  मैंने अपने दिल की झूठे  बाज़ार  में सच्चाई के  साथ आजमाइश की है | मालूम है बस फरेब है यहाँ तो  फिर क्यों मैंने सपन भर आँखों में  अपने उसूलों की नुमाइश की है | जब मेरी जिन्दगी मेरी नहीं तो क्यों? ख्वाब ले जीने की गुंजाइश की है | कुछ जज्बात हैं मेरे इस दिल के  उनको समझ खुदा से मैंने बस  कुछ खुशियों की फरमाइश की है | मैनें तो बस कुछ लम्हों के लिए  रौशन जहाँ की ख्वाहिश की है | - दीप्ति शर्मा 

खता नहीं है |

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हर इन्सान में   ज़ज्बा है सच बोलने का फिर भी  वो झूठ से बचा नहीं है | पहना है हर चेहरे ने  एक नया चेहरा  और जीता है जिन्दगी   जब वो  बोझ समझ पर , जिन्दगी उसकी सजा नहीं है  वो झूठ से बचा नहीं है | खुद को पहचान वो  चलता है उन रास्तो पर  जहाँ खुद को जानने की उसकी कोई रजा नहीं है  वो झूठ से बचा नहीं है|  कहता तो है हर बात  बड़ी ही सच्चाई से पर  नजरें कहती है उसकी  कि उसके पास सच बोलने   की कोई वजह नहीं है  इसलिए ही तो वो  झूठ से बचा नहीं है | इसमें उसकी खता नहीं है | - दीप्ति  शर्मा 

तुम्हारी इजाजत

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                    मस्त अदाओ से सराबोर  तुम्हारी जुल्फ चेहरे से  हटाऊँ क्या तुम्हारी ये इजाजत है  ये सुहाने मौसम की नजाकत है | जाहिल जमाना करे इंकार पर पायलो की झंकार की मोहब्बते दिल में इबादत है ये सुहाने मौसम की नजाकत है | इख़्तियार तेरा जो दिल में है सोच उसे में लुत्फ़  उठाऊँ क्या तुम्हारी ये इजाजत है ये सुहाने मौसम की नजाकत है | चुनरी में छुपे उस चाँद के यहाँ आने की कुछ आहट है सोच तुम्हे चारो दिशाओ में मैं तुम्हारे ही गीत गाऊं क्या तुम्हारी ये इजाजत है ये सुहाने मौसम की नजाकत है | - दीप्ति  शर्मा

ये कैसी जिन्दगी

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मेरी तबियत बहुत दिन से ख़राब है, दिन पर दिन बिगड़ ही रही है कोई सुधर नही लग रहा है, रो रही थी अपनों को देख कर , की कहीं इनसे दूर न हो जाऊ और .....             कभी जिन्दगी यूँ  करवट लेती है  कि लगता है  मेरी जिन्दगी साथ  छोड़ मेरा मुझसे  दूर जा रही है | होंठो पर हंसी रख  नकार दूँ  हर दर्द  कभी कोई विपदा  या अनहोनी घटा  मेरी जिन्दगी साथ  छोड़ मेरा मुझसे  दूर जा रही है | ये जुदा हो रही मुझसे  या मैं जुदा हूँ इससे  नहीं हम एक ही हैं  तभी तो आज , ये मुझे अपने  साथ ले जा रही है  अपनों से दूर कर  हाथ पकड़ मेरा  खुदा से मिलने जा रही है  मेरी जिन्दगी साथ  छोड़ मेरा मुझसे  दूर जा रही है | कमजोर कर दिया  जो आसन हो ले जाना  मुझसे सबसे दूर  अब समझ आया , शायद अलविदा कहना  पड़ेगा मुझे अब सबसे  क्यों कि मेरी ये  जिन्दगी मुझे छोड़ नही  साथ ले दुनिया छोड़ दूर जा रही है  मेरी जिन्दगी मेरे  साथ जा रही है | - दीप...

तेरा साथ नहीं

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तन्हा हूँ जहाँ में, अपने तो हैं साथ में  साथ मेरे है वो लम्हा  वो आलम तेरे साथ का  पर तेरा साथ नहीं | याद भी है परछाई भी तेरे आने की आहट भी गुलशन है वो हवा भी वही दिल में हैं जज्बात वही पर तेरा साथ नहीं | जीवन भी यहीं है  है जान वही  जिसको चाहा था तुने कभी  पर तेरा साथ नहीं | न बदल सकी वो फिजाये भी जो तू लाया अपने साथ कभी दिल में है वो प्यार भी जो तुझसे किया मैंने कभी पर तेरा साथ नहीं | -  दीप्ति शर्मा

कैसे बयां करूँ ?

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मैं अपनी भावनाओ को  शब्दों में कैसे बयां करूँ ? शायद कहीं ऐसा ना हो , की कोई मुझे सुने ही ना , और कोई समझे ही ना  वो बात जो सब समझे  ये मैं कैसे पता करूँ ? मैं अपनी भावनाओ को  शब्दों में कैसे बयां करूँ ? दीप्तमान हैं कुछ शब्द लफ्जो पर हर सहर प्रतिबिम्ब बन उन लफ्जो को जो समझ सकें उनका तहे दिल से मैं कैसे शुक्रिया अदा करूँ ? पर जो समझे ही नहीं उनका कैसे पता करूँ ? मैं अपनी भावनाओ को शब्दों में कैसे बयां करूँ ? - दीप्ति शर्मा