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बादलों का अट्टहास वहाँ दूर आसमान में और मूसलाधार बारिश उस पर तुम्हारा मुझसे मिलना मन को पुलकित कर रहा है मैं तुम्हारी दी लाल बनारसी साड़ी में प्रेम पहन रही हूँ कोमल, मखमली...
मौन की भाषा मौन तक खुली आँखों.. खुले कानों से ना देखी जाती है ना सुनी जाती है ये भाषा.. मौन का आवरण पहन मौन ही में दफन हो जाती है.. © दीप्ति शर्मा
मर्यादाओं की कोख से जन्मी आभासी दुनिया के सच को मुखरित कर अहसास में बदलती एक अन्तहीन आवाज़ हूँ मैं । - दीप्ति शर्मा
मैं जी रही हूँ प्रेम अँगुली के पोरों में रंग भर दीवार पर चित्रों को उकेरती तुम्हारी छवि बनाती मैं रच रही हूँ प्रेम रंगों को घोलती गुलाबी, लाल,पीला हर कैनवास को रंगती तुम्ह...
जब मैं प्रेम लिखूंगी अपने हाथों से, सुई में धागा पिरो कपड़े का एक एक रेशा सिऊगी तुम्हारे लिये मजबूती से कपड़े का एक एक रेशा जोडूंगी और जब उसे पहनने को बढ़ेगे तुम्हा...

तुम

मैंने तुम्हारे पसन्द की चूल्हे की रोटी बनायी है  वही फूली हुयी करारी सी  जिसे तुम चाव से खाते हो  और ये लो हरी हरी  खटाई वाली चटनी  ये तुम्हें बहुत पसन्द हैं ना !!!  पेट भर खा ल...
ये आँसू नहीं हैं पागल किसने कहा तुमसे? कि मैं रोती हूँ अब मैं नहीं रोती मेरे भीतर बरसों से जमी संवेदनाएँ पिघल रही हैं धीरे धीरे भावनाएँ रिस रही हैं खून जम गया है और म...